राजस्थान की भूमि
सिर्फ राजा-महाराजाओं की कहानियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने बेजोड़ स्थापत्य के लिए भी
दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ के ऊँचे पहाड़ों पर बने किले और गलियों में छिपी
नक्काशीदार हवेलियाँ आज भी बीते कल के वैभव की गवाही देती हैं।
राजस्थान में
स्थापत्य कला का जनक महाराणा कुंभा
को माना जाता है।
कविराजा श्यामलदास के अनुसार, मेवाड़
के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों
का निर्माण अकेले महाराणा कुंभा ने करवाया था।
शुक्रनीति के अनुसार
दुर्गों को 9 श्रेणियों में बांटा गया है:
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एरण
दुर्ग: जिसके
चारों ओर झाड़ियाँ और कंकड़-पत्थर हों।
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पारिख
दुर्ग: जिसके
चारों ओर गहरी खाई हो (जैसे- लोहागढ़, भरतपुर)।
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पारिध
दुर्ग: जिसके
चारों ओर मजबूत दीवार (प्राचीर) हो।
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वन
दुर्ग: जो
चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हो।
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जल
(औदक) दुर्ग: जो चारों ओर से जलराशि से घिरा हो (जैसे- गागरोन, भैंसरोड़गढ़)।
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धान्वन
दुर्ग: जिसके
चारों ओर मरुभूमि (रेगिस्तान) हो (जैसे- सोनारगढ़, जूनागढ़, भटनेर)।
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गिरि
दुर्ग: जो
ऊँची पहाड़ी पर बना हो (सर्वश्रेष्ठ उदाहरण- तारागढ़, अजमेर)।
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सैन्य
दुर्ग: जहाँ
सैनिकों का निवास हो।
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सहाय
दुर्ग: जहाँ
राजा के सगे-संबंधी और वीर योद्धा रहते हों।
यूनेस्को विश्व धरोहर
(UNESCO World Heritage): वर्ष
2013 में राजस्थान के 6 प्रमुख
दुर्गों को
विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। इसे याद रखने की शॉर्ट ट्रिक है —
"चीकु गाजर आम"
(चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, गागरोन, जैसलमेर, रणथंभौर, आमेर)।।
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इतिहास: इसका निर्माण
चित्रांगद मौर्य ने करवाया था। इस दुर्ग में इतिहास के तीन प्रसिद्ध साके हुए।
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प्रवेश
द्वार: इसके
कुल 7 प्रवेश द्वार हैं।
पांडन पोल के पास रावत बाघसिंह की छतरी, भैरव पोल व हनुमान पोल के बीच जयमल मेड़तिया व वीर कल्ला
राठौड़ की छतरी और रामपोल के पास फत्ता सिसोदिया की छतरी बनी है।
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दर्शनीय
स्थल: 13वीं
सदी में जीजाक द्वारा निर्मित जैन कीर्ति स्तंभ, कुंभास्वामी मंदिर, त्रिभुवन नारायण मंदिर (भोज मंदिर),
सतबीस देवरी जैन मंदिर, तुलजा भवानी मंदिर, रानी पद्मिनी महल, भामाशाह हवेली, नवलखा बुर्ज और फतेह प्रकाश संग्रहालय।
इसका निर्माण महाराणा
कुंभा ने अपने शिल्पी मंडन के सहयोग से (1448-1458 के मध्य) अपनी पत्नी कुंभलदेवी की याद
में करवाया था।
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कटारगढ़: इसका ऊपरी भाग 'कटारगढ़' (बादल महल) कहलाता है, जिसे 'मेवाड़ की आँख' भी कहते हैं। यहीं
महाराणा प्रताप का
जन्म हुआ
था।
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इतिहासकारों
के कथन: अबुल
फजल ने इसकी ऊँचाई को देखकर लिखा था— "यह इतनी ऊँचाई पर है कि ऊपर देखने पर
माथे की पगड़ी गिर जाती है।" कर्नल टॉड ने इसकी तुलना 'एस्ट्रकन'
से की है।
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प्रमुख
घटनाएँ: महाराणा
उदयसिंह और महाराणा प्रताप दोनों का राज्याभिषेक इसी दुर्ग में हुआ था। पन्नाधाय
अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह को बनवीर से बचाकर यहीं लाई थीं।
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दर्शनीय
स्थल: नीलकण्ठ
महादेव मंदिर (यूनानी शैली), झालीरानी
का मालिया, झालीबाव बावड़ी और
उड़ना पृथ्वीराज की 12 खंभों की छतरी।
गोरहरा पहाड़ी पर
स्थित इस धान्वन
दुर्ग की
नींव 1155 ई. में जैसल भाटी ने
रखी थी। पीले पत्थरों से बिना चूने के बने होने के कारण इसे 'स्वर्णगिरि' या 'रेगिस्तान का जहाज' भी कहते हैं। इस किले में ढाई
(2.5) साके हुए थे (तीसरा
अर्ध-साका था, जिसमें
केसरिया हुआ पर जौहर नहीं)।
ग. रणथंभौर दुर्ग
(सवाई माधोपुर)
चौहान शासकों द्वारा
निर्मित इस दुर्ग के बारे में अबुल फजल ने कहा था— "अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह बख्तरबंद है।" यहाँ का प्रसिद्ध त्रिनेत्र
गणेश मंदिर, हम्मीर
देव द्वारा निर्मित 32 खंभों
की 'न्याय की छतरी' और सुपारी महल (हिंदू, मुस्लिम व ईसाई आस्था का संगम) मुख्य आकर्षण हैं।
राजा मानसिंह द्वारा
निर्मित यह दुर्ग हिंदू और मुस्लिम स्थापत्य शैली का अनूठा मिश्रण है। यहाँ का शीश
महल राज्य
का सर्वश्रेष्ठ शीश महल माना जाता है, जिसकी दीवारों पर काँच की अद्भुत जड़ाई की गई है।
राजस्थान की हवेलियाँ
यहाँ के सेठों के वैभव और कलाकारों की बारीकी को दर्शाती हैं। वल्लभ संप्रदाय में
मंदिरों को भी 'हवेली'
कहा जाता है।
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बीकानेर: इसे 'हजार
हवेलियों का शहर' कहा
जाता है। यहाँ की बच्छावतों की हवेली और रामपुरिया हवेली बहुत प्रसिद्ध हैं।
·
शेखावाटी: यह क्षेत्र अपने भित्ति
चित्रण (Frescos) के
लिए दुनिया भर में मशहूर है, इसलिए
शेखावाटी को 'ओपन आर्ट गैलरी' भी कहा जाता है।
·
चूरू
की हवेलियाँ: यहाँ की सुराणाओं की हवेली सबसे खास है, जिसमें 1100
दरवाजे और खिड़कियाँ हैं! इसके अलावा
दानचंद चौपड़ा की हवेली और मालजी का कमरा भी दर्शनीय हैं।
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झुंझुनूं
की हवेलियाँ: महनसर की 'सोने-चाँदी की हवेली' अपनी भव्यता के लिए जानी जाती है। इसके
अलावा नवलगढ़ की पोद्दार हवेली और मंडावा की लड़ियों की हवेली कला के बेजोड़ नमूने
हैं।
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