all the exams to be held in Rajasthan. It provides knowledge about questions and answers of exams like REET, Patwari, SI, VDO, Teacher exam to be held in Rajasthan. ' name='description'/> राजस्थान की हस्तकला - Rajasthan General Knowledge Rajasthan Ki Sbhi Bharti Parikshao Ke Liye Reet,SI,Patwari,VDO, All Exam

SBR

SBR

राजस्थान की हस्तकला

import weasyprint html_content = """ राजस्थान की हस्तकलाएँ - संपूर्ण प्रामाणिक सचित्र निर्देशिका

राजस्थान की सुप्रसिद्ध हस्तकलाएँ

हस्तशिल्प, कला धरोहर एवं लघु उद्योग विधाओं की संपूर्ण सचित्र मार्गदर्शिका

हस्तकला (Handicrafts of Rajasthan) — एक समग्र परिचय

राजस्थान को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक जड़ों, चटकीले सतरंगी रंगों और उत्कृष्ट निर्माण शैलियों के कारण पूरे भारतवर्ष में 'हस्तकलाओं का आगार' अथवा 'हस्तकलाओं का अजायबघर' के रूप में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. हस्तकला का मूल अर्थ मानव हाथों के सूक्ष्म कौशल और स्थानीय कारीगरी से कलात्मक व दैनिक जीवनोपयोगी वस्तुओं का सृजन करना है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. वर्तमान औद्योगिक एवं आर्थिक परिदृश्य में हस्तशिल्प क्षेत्र को 'ऑरेंज इकॉनॉमी (Orange Economy)' के नाम से पुकारा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

राज्य के पारंपरिक शिल्पकारों को आर्थिक संबल देने तथा इस अनमोल कला संस्कृति को वैश्विक मंच प्रदान करने हेतु राज्य सरकार द्वारा 'राजस्थान हस्तशिल्प नीति 2022' लागू की गई है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. राजस्थान में जयपुर को 'हस्तकला का तीर्थ' माना जाता है, जबकि जोधपुर का बोरानाडा क्षेत्र हस्तशिल्प उत्पादों के निर्यात एवं औद्योगिक विकास का प्रधान केंद्र है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

1. थेवा कला (Thewa Art) — प्रतापगढ़

प्रधान केंद्रप्रतापगढ़ भौगोलिक संकेतक (G.I. Tag 2014) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] जनक / आदिपुरुषनाथू जी सोनी (राजा सावंत सिंह का शासनकाल) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
प्रयुक्त सामग्रीविशेष रंगीन बेल्जियम काँच (प्रधानतः हरा आधार) एवं शुद्ध सुवर्ण तार [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] वैश्विक पहचानप्रतिष्ठित 'Encyclopaedia Britannica' में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]

विस्तृत विवरण: काँच की रंगीन सतहों पर सोने की अत्यंत बारीक, सूक्ष्म और मनमोहक नक्काशी या चित्रांकन करने की पारलौकिक कला को 'थेवा कला' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. यह कलात्मक धरोहर पिछले 500 वर्षों से केवल प्रतापगढ़ के एक ही विशिष्ट 'राजसोनी' परिवार तक पूरी तरह सीमित है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. कला की अखंड गोपनीयता को अक्षुण्ण रखने के लिए इसे परिवार की बेटियों को भी नहीं सिखाया जाता, केवल बेटों और बहुओं तक सीमित रखा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. थेवा कला में मुख्य रूप से नारी श्रृंगार के आभूषण, शाही डिब्बियाँ, इत्रदान, और लोक देवी-देवताओं के चित्र स्वर्ण परतों से उकेरे जाते हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इस कला में अतुलनीय योगदान के लिए महेश राज सोनी को वर्ष 2014 में राष्ट्रपति द्वारा 'पद्मश्री' से नवाजा गया तथा गिरीश कुमार सोनी को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. नवंबर 2002 में भारत सरकार द्वारा इस पर डाक टिकट भी जारी किया जा चुका है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

चित्र 1: प्रतापगढ़ की थेवा कला का वास्तविक प्रदर्शन — गहरे हरे बेल्जियम काँच पर शुद्ध सोने के तारों से उकेरी गई शाही मोर एवं वल्ली आकृति

2. ब्लू पॉटरी (Blue Pottery) — जयपुर

प्रधान केंद्रजयपुर एवं नीमकाथाना (सीकर क्षेत्र) G.I. Tag प्राप्त [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] स्वर्ण काल / विकासकर्तामहाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय (शासनकाल 1835-1880 ई.) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
कला प्रणेता / शिल्पीस्व. पद्मश्री कृपाल सिंह शेखावत (वर्ष 1976 में पद्मश्री सम्मानित) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] सामग्री संघटकक्वार्टज़ पाउडर, काँच, मलमल मिट्टी, सागी, कथीरा व गोंद (सच्ची मिट्टी विहीन) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]

विस्तृत विवरण: चीनी मिट्टी (China Clay) से निर्मित बर्तनों, फूलदानों व टाइलों पर गहरे नीले (कोबाल्ट ऑक्साइड) एवं फिरोजी (कॉपर ऑक्साइड) रंगों से आकर्षक चित्रकारी व बेल-बूटे उकेरने की चीनी विधा को 'ब्लू पॉटरी' या 'कामचीनी' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. यह मूलतः फारस (ईरान) की विधा है, जो मुगलों के माध्यम से भारत आई [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. आमेर के राजा मानसिंह प्रथम इस विधा के शिल्पकारों को लाहौर से राजस्थान लाए थे, किंतु इसका चरम विकास सवाई रामसिंह द्वितीय के समय हुआ, जिन्होंने चूड़ामन और कालूराम कुम्हार को यह विधा सीखने दिल्ली भेजा था [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. कृपाल सिंह शेखावत ने नीले रंग के अतिरिक्त 25 नए रंगों का समावेश कर एक अनूठी 'कृपाल शैली' विकसित की और इसे वैश्विक ख्याति दिलाई [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. अन्य कलाकारों में नाथी बाई, त्रिलोक चंद, दुर्गालाल व हनुमान सहाय प्रसिद्ध हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

अन्य पॉटरी शैलियाँ: राजस्थान में बीकानेर की सुनहरी पॉटरी, अलवर की कागजी पॉटरी (डबल कट वर्क) तथा नाथद्वारा की ब्लैक पॉटरी (काली मिट्टी से निर्मित, स्मोक फायरिंग व चाँदी की जरी वर्क युक्त) भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

चित्र 2: जयपुर की जगप्रसिद्ध 'ब्लू पॉटरी' — श्वेत काओलिन चीनी मिट्टी पात्र पर कोबाल्ट ऑक्साइड नीले व फिरोजी रंगों की हस्त-चित्रकारी

3. कठपुतली कला (Puppetry) — उदयपुर, जयपुर, चित्तौड़गढ़

प्रमुख केंद्रउदयपुर, चित्तौड़गढ़ एवं जयपुर (कठपुतली नगर) G.I. Tag प्राप्त [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] प्रमुख जातिनट या भाट जाति के पारंपरिक कलाकार [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
संरक्षण व विकासभारतीय लोक कला मंडल, उदयपुर (स्थापना: स्व. देवीलाल सामर) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] ऐतिहासिक नाटकअमर सिंह राठौड़, सिंह-बतीसी, पृथ्वीराज-संयोगिता [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]

विस्तृत विवरण: अरड़ू या काठ (लकड़ी) से निर्मित कलात्मक पुतली को रंग-बिरंगे वस्त्रों, सूत और धागों की सहायता से उंगलियों के संचालन द्वारा पर्दे पर नचाने की विधा 'कठपुतली कला' कहलाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. यह राजस्थान का एक अत्यंत प्राचीन लोक नाट्य विधा व लघु कला उद्योग है, जिसका विपणन व संरक्षण राजसिको (स्थापना 3 जून 1961) द्वारा किया जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. उदयपुर में स्थापित भारतीय लोक कला मंडल ने इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्रदान की [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. प्रतिवर्ष 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस के रूप में मनाया जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. कठपुतलियों को मुख्यतः चार विधाओं में विभाजित किया जाता है: धागा कठपुतली (राजस्थान की मूल पारंपरिक विधा), छाया कठपुतली, छड़ कठपुतली और दस्ताना कठपुतली [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इसके प्रमुख शिल्पकारों में गुलाबो देवी, लीलाराम, लालचंद भाट और पप्पू भाट विख्यात हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

चित्र 3: राजस्थान की पारंपरिक कठपुतली विधा — मखमली पर्दे के पीछे धागों के सहारे ऐतिहासिक अमर सिंह राठौड़ नाटक का सजीव मंचन

4. उस्ता कला / मुनव्वती कला — बीकानेर

प्रधान केंद्रबीकानेर G.I. Tag (1 अगस्त 2023 प्राप्त) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] आगमन / विकासमहाराहा अनूप सिंह के समय लाहौर के उस्ताद कलाकारों द्वारा [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
प्रधान कलाकारस्व. हिसामुद्दीन उस्ता (1986 पद्मश्री), वर्तमान में मोहम्मद हनीफ उस्ता [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] प्रसिद्ध उत्पादऊँट की खाल की पेटियाँ, कुप्पियाँ, डिब्बियाँ, वॉल हैंगिंग, पेन स्टैंड [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]

विस्तृत विवरण: ऊँट की मृत खाल से बनी वस्तुओं, काष्ठ, दीवारों, धातु अथवा संगमरमर की सतह पर शुद्ध सोने की बारीक सुनहरी नक्काशी (गोल्ड एम्बॉसिंग) तथा कुंदन व प्राकृतिक रंगों से की जाने वाली बारीक चित्रकारी को 'उस्ता कला' या 'मुनव्वती कला' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. बीकानेर की मथेरण जाति भी इस विधा में पूरी तरह सिद्धहस्त मानी जाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. बीकानेर में उस्ता शिल्प को बढ़ावा देने के लिए राजसिको द्वारा 'कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर' की स्थापना की गई थी [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. ऊँट के शरीर के जीवित बालों को विशेष डिज़ाइनों में काटकर की जाने वाली बालों की चित्रकारी को 'जटकतराई' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

चित्र 4: बीकानेर की विश्वविख्यात उस्ता कला — शोधित ऊँट की चमड़े की कूपी (जलपात्र) सतह पर विशुद्ध सोने के पत्तरों से उत्कीर्ण सुनहरी नक्काशी

5. टेराकोटा कला (मृत्तिका शिल्प) — मोलेला (राजसमंद)

मुख्य केंद्रमोलेला (राजसमंद) G.I. Tag प्राप्त, हरजी (जालोर), बसवा (दौसा) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] शिल्प प्रक्रियाचिकनी लाल मिट्टी + गधे की लीद का सम्मिश्रण, 800°C भट्टी तापन [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
शिखर कलाकारस्व. मोहनलाल कुмаवत (पद्मश्री 2012, ₹5 का डाक टिकट 2021) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] क्षेत्रीय विशेषताहरजी गाँव में मामाजी के घोड़े, बसवा गाँव में चित्रात्मक कुंजा बर्तन [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]

विस्तृत विवरण: नदियों की विशेष चिकनी लाल मिट्टी (मृत्तिका) में गधे की लीद मिलाकर सुखाया जाता है, और फिर मिट्टी के फलकों, मूर्तियों व खिलौनों को आग की भट्टी में 800 डिग्री सेल्सियस के उच्च तापमान पर पकाया जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इस सुंदर शिल्प कला को 'टेराकोटा' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. पकने के बाद इन्हें लाल, सिंदूरी, पीले, हरे व फिरोजी चटकीले रंगों से अलंकृत किया जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. मोलेला गाँव इसके लिए वैश्विक स्तर पर विख्यात है, जहाँ के मोहनलाल कुमावत को पद्मश्री सम्मान प्राप्त हुआ था [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. जालोर का हरजी गाँव लोक देवता 'मामाजी के मिट्टी के घोड़े' बनाने के लिए प्रसिद्ध है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. नागौर का बु-नरावता गाँव मिट्टी के सुंदर गुलदस्तों, गमलों व खिलौनों के लिए जाना जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. प्रमुख शिल्पकारों में खेमराज कुमार (राष्ट्रपति अवॉर्ड), राजेन्द्र कुमार, तथा गगन बिहारी दाधीच (मोलेला आर्ट का जादूगर) शामिल हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

चित्र 5: मोलेला मृत्तिका शिल्प — उच्च ताप भट्टी पर पकी मिट्टी से निर्मित लोक देवों की मूर्तियाँ एवं जालोर के पारंपरिक मामाजी के घोड़े

6. मीनाकारी कला (जड़ाऊ कला) — जयपुर

प्रधान केंद्रजयपुर (धातु मीनाकारी का सबसे बड़ा वैश्विक केंद्र) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] शिल्पी आगमनमहाराजा मानसिंह प्रथम द्वारा लाहौर से जयपुर लाया गया [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
खुदाई प्रक्रियारत्नों व आभूषणों पर हल्की हल्की नक्काशी, जिसे 'टंचाई' कहते हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] प्रधान शिल्पी सम्मानसरदार कुदरत सिंह (वर्ष 1998 में पद्मश्री सम्मान से विभूषित) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]

विस्तृत विवरण: स्वर्ण, रजत, पीतल अथवा तांबे जैसी धातुओं की सतह को खोदकर उसमें विभिन्न रसायनों व कांच के पिघले हुए रंगीन एनामेल (मीना) को भरने की सूक्ष्म पारदर्शी विधा को 'मीनाकारी' या 'जड़ाऊ कला' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. सोने, चाँदी व तांबे पर मीनाकारी करने के लिए मुख्यतः चटक लाल व हरे रंगों का प्रयोग किया जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. काशीराम व कैलाशचंद इस कला के अन्य राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त श्रेष्ठ कारीगर हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

धातु का प्रकार [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] मीनाकारी का विख्यात केंद्र [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
चाँदी (Silver Work)नाथद्वारा (राजसमंद) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
पीतल (Brass Work)जयपुर तथा अलवर [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
ताँबा (Copper Work)भीलवाड़ा [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
सोना (Gold Work)प्रतापगढ़ [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
चित्र 6: जयपुर की उत्कृष्ट जड़ाऊ मीनाकारी — सुवर्ण आभूषण खंडों पर माणिक्य लाल, नीले व पन्ना हरे मीना रासायनिक रंगों का सूक्ष्म संयोजन

7. वस्त्र हस्तशिल्प (रंगाई, छपाई एवं बंधेज कला)

राजस्थान का वस्त्र उद्योग हस्तकलाओं की दृष्टि से वैश्विक स्तर पर अत्यंत समृद्ध व अनूठा है, जिसके प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं:

A. कोटा डोरिया या मंसूरिया साड़ी (कैथून, कोटा)

यह सूती व रेशमी धागों के साथ सुनहरे जरी के तारों का प्रयोग कर विशेष 'चौकोर चेक ग्रिड बुनाई (Check Pattern)' से तैयार की जाने वाली विश्वप्रसिद्ध साड़ी है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. वर्ष 1716 ई. में कोटा के दीवान झाला जालिमसिंह ने मैसूर के अहमद मंसूरिया नामक बुनकर को कोटा बुलाकर यहाँ हथकरघा उद्योग की स्थापना की थी, जिससे इसका नाम मंसूरिया साड़ी पड़ा [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. यह साड़ी अपने 'पंख जैसे हल्के वजन' और महीनता के लिए विख्यात है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. कोटा डोरिया को उत्पादन हेतु 2006 में तथा लोगो हेतु 2011 में G.I. टैग मिला, और यह जी.आई. टैग पाने वाली राजस्थान की पहली हस्तकला धरोहर है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. श्रीमती जैनब इसकी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बुनकर कलाकार हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

B. बंधेज कला (Tie & Dye) — जयपुर व जोधपुर

कपड़ों को बारीक धागों की सहायता से अलग-अलग स्थानों से बाँधकर मनचाहे रंगों में रंगने की पारंपरिक विधा को 'बंधेज' या 'टाई एंड डाई' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. बंधेज का कार्य करने वाले कलाकारों को 'बंधारा' या 'रंगरेज' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. सीकर के फूल भाटी व बाघ भाटी ने इस कला की मजबूत नींव रखी थी [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. जोधपुर के मोहम्मद तैय्यब खान इसके सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. कपड़ों पर दानेदार बारीक बंधाई को 'मोठड़ा' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

C. दाबू प्रिंट, अजरख प्रिंट एवं सांगानेरी प्रिंट

  • दाबू प्रिंट (आकोला, चित्तौड़गढ़): रंगाई-छपाई के दौरान जिस स्थान पर रंग नहीं चढ़ाना हो, उसे लई, मोम या लुगदी के विशेष मिश्रण से दबा दिया जाता है, जिसे 'दाबू' कहते हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. सवाई माधोपुर में मोम का दाबू, बगरू में गेहूँ के बींथण का दाबू, बालोतरा में मिट्टी का दाबू तथा आकोला में गोंद का दाबू प्रसिद्ध है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • अजरख व मलीर प्रिंट (बालोतरा): अजरख प्रिंट में नीले व लाल रंगों तथा ज्यामितीय तुर्की अलंकरण का प्रयोग कर कपड़े के दोनों तरफ छपाई की जाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इसके प्रसिद्ध कलाकारों में मो. यासीन व रणमल खत्री प्रमुख हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. मलीर प्रिंट में कत्थई व काले रंगों की मुख्य प्रधानता होती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • सांगानेरी प्रिंट (जयपुर): मलमली कपड़ों पर काले और लाल रंगों का अधिक प्रयोग कर सुंदर प्राकृतिक बेल-बूटों की छपाई की जाती है, जिसके प्रमुख शिल्पी मुन्नालाल गोयल हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. वर्ष 2010 में इसे G.I. टैग मिला [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • बगरू प्रिंट (जयपुर): वनस्पति व प्राकृतिक रंगों का प्रयोग कर ऑफ-व्हाइट कपड़े पर बेल-बूटों की छपाई की जाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इसके प्रमुख कलाकार रामकिशोर छीपा को वर्ष 2009 में पद्मश्री मिला [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
चित्र 7: राजस्थान के गौरवमयी वस्त्र कला रूप — बाईं ओर सतरंगी जयपुर का 'लहरिया बंधेज' तथा दाईं ओर बालोतरा की ज्यामितीय 'अजरख छपाई शैली'

8. काष्ठ कला, बादला एवं अन्य महत्वपूर्ण हस्तशिल्प विधाएँ

A. काष्ठ कला (Wooden Craft) — बस्सी (चित्तौड़गढ़)

लकड़ी पर सुंदर बारीक नक्काशी और लोक-धार्मिक आकृतियाँ बनाने की विधा राजस्थान में अत्यंत प्राचीन है, जिसके प्रमुख जन्मदाता प्रभात जी सुथार माने जाते हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. बस्सी गाँव इसका प्रधान केंद्र है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

  • बेवाण: यह लकड़ी से निर्मित छोटा सिंहासननुमा देवालय होता है जो तीन तरफ से बंद और सामने से खुला होता है, जिसे 'मिनिएचर वुडन टेम्पल' या 'चलता-फिरता देवघर' भी कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. जलझूलनी एकादशी व अनंत चतुर्दशी को बेवाण निकालने की सदियों पुरानी परंपरा है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • कावड़: कपाटों (द्वारों) वाली मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति, जिस पर पूरी लाल रंग की पृष्ठभूमि पर काले रंग से पौराणिक कहानियाँ, रामकथा व धार्मिक प्रसंग चित्रित होते हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इसके प्रमुख चित्रकारों में मांगीलाल मिस्त्री, द्वारिका व सत्यनारायण विख्यात हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • तोरण: विवाह के समय वधू के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर टांगी जाने वाली बेर या खेजड़ी की लकड़ी की तोरण आकृति (शक्ति व पराक्रम का प्रतीक) होती है, जिसके शीर्ष पर मोर या तोता बना होता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. तोरण निर्माण के लिए जयपुर का त्रिपोलिया बाज़ार पूरे देश में प्रसिद्ध है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • चौपड़े व बाजोट: मांगलिक अवसरों पर कुंकुम-अक्षत रखने हेतु कलात्मक लकड़ी के पात्र 'चौपड़े' कहलाते हैं तथा पूजा व भोजन के समय थाली रखने हेतु प्रयुक्त चतुष्कोणीय चौकी 'बाजोट' कहलाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

B. बादला (Badla) — जोधपुर

जोधपुर का 'बादला' मरुस्थलीय जल संरक्षण का एक बेजोड़ पारंपरिक साधन है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. यह जस्ते (जिंक धातु) से निर्मित पानी भरने का विशेष बर्तन होता है, जिसके ऊपर चमड़े या कलात्मक मखमल व कपड़ों की परत चढ़ाई जाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. इंसुलेशन व जिंक के गुणों के कारण इसमें भीषण गर्मी में भी पानी लंबे समय तक प्राकृतिक रूप से ठंडा और शीतल बना रहता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

C. दरी, कालीन एवं नमदा उद्योग

गलीचा (कालीन) निर्माण कला राजा मानसिंह के काल में ईरान से जयपुर आई थी [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. जयपुर व बीकानेर की जेलों में कैदियों द्वारा सुंदर दरियाँ बनाई जाती हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. सुंदर व मजबूत दरी निर्माण के लिए नागौर का टांकला गाँव, जोधपुर का सालावास गाँव तथा दौसा का लवाण गाँव संपूर्ण देश में विख्यात हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. धौलपुर की कांता देवी गलीचा निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. टोंक जिला भेड़ों की ऊन को कूटकर जमाई जाने वाली ऊनी चटाई या फर्श 'नमदा' के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

D. लाख का काम एवं पेपरमेशी (कुट्टी का काम)

जयपुर लाख की सुंदर कलात्मक चूड़ियों, खिलौनों व सजावटी सामानों का मुख्य केंद्र है, जहाँ लाख का काम करने वाले व्यक्ति को 'मनीहार' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. प्रमुख कलाकार अयाज अहमद हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. जयपुर का लाख से निर्मित 'गुलाल गोटा' देशभर में प्रसिद्ध है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. वहीं कागज, चाक, फेवीकोल, गोंद व मिट्टी के घोल से तैयार की गई लुगदी को साँचे में ढालकर खिलौने व पात्र बनाने की कला 'कुट्टी या पेपरमेशी' कहलाती है, जो सवाई रामसिंह द्वितीय के काल में लोकप्रिय हुई [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. सिटी पैलेस में रखा पेपरमेशी का प्रसिद्ध घोड़ा इसका उत्कृष्ट प्रमाण है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].

E. जेवर कला: कोफ्तागिरि, तहनिशा एवं तारकशी

  • कोफ्तागिरि: फौलाद अथवा लोहे के हथियारों, तलवारों व ढालों पर सोने या चाँदी के पतले तारों की सूक्ष्म कसीदाकारी करने की विधा 'कोफ्तागिरि' कहलाती है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. वर्ष 2023 में उदयपुर की कोफ्तागिरि को G.I. टैग प्राप्त हुआ है, जिसके प्रसिद्ध कलाकारों में डॉ. श्यामलता व राजेश गहलोत शामिल हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • तहनिशा: पीतल या तांबे की सतह पर डिज़ाइन को गहरा खोदकर उसमें सोने-चाँदी का तार भरने की कला (मुख्य केंद्र: जयपुर व अलवर) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • तारकशी के गहने: चाँदी के अत्यंत पतले व महीन तारों को आपस में गूंथकर कलात्मक आभूषण बनाने की कला, जो नाथद्वारा (राजसमंद) की प्रसिद्ध है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
  • चमड़े की जूतियाँ / मोजड़ी: मोची व रेगर जाति द्वारा निर्मित मोजड़ियाँ भीनमाल (जालोर), बाड़मेर व जोधपुर की प्रसिद्ध हैं [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]. दूल्हे की विशेष जूती को 'बिनोटा' तथा बच्चों की जूतियों को 'खाल्या या खोल्या' कहा जाता है [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf].
चित्र 8: बाईं ओर चित्तौड़गढ़ के बस्सी गाँव की देव-संस्कृति का प्रतीक काष्ठ कलाकृति 'बेवाण' एवं दाईं ओर जोधपुर का प्रसिद्ध जस्ता-निर्मित 'बादला' जलपात्र

9. राजस्थान के अन्य विविध हस्तशिल्प एवं उनके प्रमुख विख्यात केंद्र

नीचे दी गई सारणी में राजस्थान के विभिन्न जिलों में फैले हुए विशिष्ट हस्तशिल्प उद्योगों और पारंपरिक निर्माण केंद्रों की विस्तृत सूची दी गई है:

हस्तशिल्प उत्पाद / विधा [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf] संबंधित विख्यात औद्योगिक केंद्र (राजस्थान) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
जस्ते (जिंक) की सुंदर मूर्तियाँजोधपुर [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
रमकड़ा उद्योग (सोपस्टोन/घिया पत्थर के खिलौने)गलियाकोट (डूंगरपुर) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
खेसले (सर्दियों के ओढ़ने के कलात्मक वस्त्र)लेटा गाँव और गुढ़ा बालोतान (जालोर) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
पेच वर्क (कपड़ों को जोड़कर डिज़ाइन बनाना)शेखावाटी अंचल [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
खेती के मजबूत पारंपरिक औजारनागौर [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
नक्काशीदार फर्नीचर उद्योगबाड़मेर [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
मिरर वर्क (कपड़ों पर काँच की जड़ाई)जैसलमेर तथा चौहटन (बाड़मेर) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
पाव (250 ग्राम वजन वाली) विश्वप्रसिद्ध रजाईजयपुर [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
खेलकूद का सामान निर्माण उद्योगहनुमानगढ़ [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
पारंपरिक कलात्मक मोजड़ी (जूतियाँ)भीनमाल (जालोर) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
छाता (अम्ब्रेला) निर्माण उद्योगफालना (पाली) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
पारंपरिक तीर-कमान निर्माण शिल्पबोडीगामा (डूंगरपुर) तथा चंदूजी का गढ़ा (बांसवाड़ा) [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
शाही तलवार निर्माण हस्तशिल्पसिरोही [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
नसवार (सूंघने का चूर्ण) उद्योगब्यावर [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
पारंपरिक बीड़ी उद्योगटोंक [cite: uploaded:राजस्थान की हस्तकला.pdf]
""" with open("rajasthan_handicrafts_perfect_guide.html", "w", encoding="utf-8") as f: f.write(html_content) print("HTML file generated with explicit space on header. Now compiling to PDF...") weasyprint.HTML("rajasthan_handicrafts_perfect_guide.html").write_pdf("rajasthan_handicrafts_perfect_guide.pdf") print("PDF successfully updated and generated.")
Blogger द्वारा संचालित.