राजस्थान की कला संस्कृति (भाग 1)
1. लोक वाद्ययंत्र
सारंगी के
प्रकार:
1. धानी
सारंगी 2.
सिंधी सारंगी
3. गुजरातन सारंगी
4. डेढ़ पसली सारंगी
5. जोगिया
सारंगी (पूर्वी राजस्थान में जोगियों द्वारा बजाई जाती है।)
सुषिर
वाद्ययंत्र :-
सूत्र: कसम से अब पूनमो बाँ सतु खा
रहे हैं। पेली बोली कोनी।
1. करणा 2. सतारा 3. मशक 4. अलगोजा: राजस्थान का राज्य वाद्य
यंत्र।
प्रमुख
कलाकार: रामनाथ चौधरी, धोधे खान
(माँगता, बाड़मेर)। रामनाथ चौधरी नाक से अलगोजा
बजाते थे।
5. बांकिया 6. पूंगी 7. नड़
(लम्बी बांसुरी जैसा): प्रमुख कलाकार - करणा भील।
8. मोरचंग:-
इसे 'ज्यूहॉर्प' भी कहते हैं। 9. बांसुरी:- हरिप्रसाद चौरसिया
10.शहनाई
(नफ़ीरी):- बिस्मिल्लाह खान
11.सुरनई:- पेपे खान (जैसलमेर)
12. तुरतई
तत्
वाद्ययंत्र :-
1.पेली 2.रावणहत्था:-
आधे कटे नारियल से बनाया जाता है। 3.कैनरा 4.बोली 5.काणी
6.सुरिन्दा 7.कामायचा:- प्रमुख कलाकार - साकर खाँ (2012 में पद्मश्री पुरस्कार दिया गया)।
8.दुकाका 9.जंतर:- देवनारायण जी की फड़ का
वाचन करते समय।
10.वीणा
11.भपंग:- प्रमुख कलाकार - जहूर खान
मेवाती।
12.चिकारा 13.सुरमण्डल 14.रबाब/रबाज
15.एकतारा 16.गूजरी 17.सारंगी:- प्रमुख कलाकार - रामनारायण
चौधरी एवं सुल्तान खान।
घन
वाद्ययंत्र :-
1.श्रीमण्डल 2.झाँझ 3.रमझोळ:-घुंघरूओं
की पट्टी।
4.मंजीरा 5.झालर 6.लेजिम 7.भरणी
8.थाली 9.घुँघरू 10.हाकल 11.घुरालियो (कालबेलियों का वाद्ययंत्र)
12.खड़ताल:- प्रमुख कलाकार - गाजी खाँ
बरना (जैसलमेर)। खड़ताल का जादूगर - सिदिक खाँ मागणियार (झाँपाली गाँव, बाड़मेर)।
13.पीर घंटा
अवनद्ध वाद्ययंत्र :-
1.माँदल 2.पखावज:- पंडित पुरूषोत्तम दास। 3.ढोलक 4.नगाड़ा 5.चंग 6.धौसा
7.माठ/माटे:- पाबूजी के पवाड़े (लोकगाथा)
गाते समय।
8.डेरू
9.नौबत:- मंदिरों एवं महलों के द्वार
पर बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र। 10.डमरू
11.ढफड़ी
12.दमामा
13.टामक 14.ताशा:- मोहर्रम के अवसर पर।
2. लोक नाट्य
रम्मत
लोकनाट्य:- 'रमने
वाला'।
- शुरूआत:
जैसलमेर से।
- वर्तमान
में रम्मत बीकानेर की प्रसिद्ध है। बीकानेर में रम्मत का खेल लकड़ी के पाटों पर
खेला जाता है।
- खिलाड़ी:
खेलार।
तेज कवि
(जैसलमेर) :- इन्होंने
'स्वतंत्रता
बावनी' ग्रंथ
लिखा था और इसे गाँधीजी को भेंट किया था। इन्होंने
'श्री कृष्णा कंपनी' के नाम से रम्मत का अखाड़ा
शुरू किया था।
नौटंकी
लोकनाट्य:- पूर्वी
राजस्थान।
- इसकी शुरूआत डीग (भरतपुर)
निवासी भूरीलाल ने की थी।
- हाथरस शैली की नौटंकी
भरतपुर की प्रसिद्ध है।
- गुलाल बाई एवं कृष्णा
कुमारी का संबंध नौटंकी कला से है।
स्वांग लोकनाट्य:- बहुरूपिया कला।
- प्रमुख कलाकार: जानकीलाल
भांड (भीलवाड़ा) - इन्हें 'मंकीमैन' के नाम से जाना जाता है।
- परशुराम (केलवाड़ा, उदयपुर)।
लीलाएँ :-
1.रामलीला: 2.सवारी की
रामलीला: जुरहरा (भरतपुर)
3.मूक अभिनय पर आधारित रामलीला: बिसाऊ
4.ढाई कड़ी दोहे की रामलीला:
मांगरोल (बारां)
5.दर्शकों द्वारा धनुष तोड़े जाने की रामलीला: अटरू
6.सनकादियों की रामलीला:
घोसुण्डा (चित्तौड़गढ़)
7.गौर की रामलीला: आबू रोड़ (सिरोही)
रासलीला:
राजस्थान में रासलीला का
प्रमुख केन्द्र फुलेरा (जयपुर) है।
रासलीला के कलाकार 'स्वरूप' कहलाते हैं।
गंवरी लोक
नाट्य: मेवाड़
(भील समुदाय)।
अन्य
नाम: राई लोक नाट्य। यह सबसे प्राचीन लोक नाट्य है, इसे लोकनाट्यों का आधारस्तंभ कहा जाता है | यह रक्षाबंधन के दूसरे दिन
से प्रारंभ होकर 40 दिन तक
चलता है। यह सुबह से सायं तक चलता है। यह लोक नाट्य भस्मासुर की कथा पर आधारित है।
राई (शिव), बुड़िया, झामट्या एवं खटकुड़िया
पात्रों का संबंध गवरी लोक नाट्य से है। गवरी लोक नाट्य पर आधारित भानू भारती ने 'पशु गायत्री' नाटक लिखा था। गोमा मीणा, कालू कीर, खाड़लिया भूत, शेर-सूअर की लड़ाई आदि
नाटिकाओं का संबंध गवरी लोक नाट्य से है।
चारबैंत लोकनाट्य: टोंक। वाद्ययंत्र: डफ / ढफ। इस लोकनाट्य की शुरूआत टोंक
के नवाब फैज्जुला खान के
समय अब्दुल करीम खान ने की थी।
फड़ - शाहपुरा (भीलवाड़ा) प्रमुख कलाकार / जनक :
श्रीलाल जोशी
|
फड़ का नाम |
वाचनकर्ता |
वाद्य यंत्र |
विशेषता |
|
पाबूजी की फड़ |
भील/थोरी/नायक |
रावणहत्था |
सबसे लोकप्रिय फड़ |
|
रामदेवजी की फड़ |
कामड़ भोपे |
रावणहत्था |
|
|
देवनारायणजी की फड़ |
गुर्जर भोपे |
जंतर |
सबसे लंबी व सबसे छोटी फड़ |
|
रामदला-कृष्णदला की फड़ |
भाट भोपे |
वाद्ययंत्र नहीं |
------ |
|
भैंसासुर की फड़ |
नहीं होता है |
वाद्ययंत्र नहीं |
-------- |
नोट:- 1992
में देवनारायण जी की फड़ पर डाक टिकट जारी किया गया।
तमाशा लोक
नाट्य:- जयपुर।
जयपुर में इसकी शुरूआत सवाई
प्रतापसिंह के समय बंशीधर भट्ट ने की थी। तमाशा मूल रूप से महाराष्ट्र का था।
रामसिंह द्वितीय ने तमाशा कलाकारों को गुणीजन खाने (संगीत-केन्द्र) में प्रवेश की
अनुमति दी थी।
ख्याल लोकनाट्य (खेल) :-
1.कुचामणी ख्याल:- कुचामन
(नागौर)। प्रवर्तक / जनक - लच्छीराम।
2.चिड़ावा / शेखावटी ख्याल:- नानूराम चिड़ावा।
3.जयपुरी ख्याल:- जयपुर। इसमें महिलाओं की भूमिका
महिलाएँ ही निभाती हैं।
4.ढप्पाली ख्याल:- अलवर।
अली बक्शी
ख्याल:- अलवर।
हैला ख्याल:- दौसा। जनक - सायर हैला। वाद्ययंत्र - नौबत।
कन्हैया ख्याल:- भरतपुर। इसे 'रसिया दंगल ख्याल' भी कहा जाता है। इसका मुख्य
पात्र 'मेड़िया' कहलाता है।
तुर्रा-कलंगी ख्याल:- चित्तौड़गढ़। (तुर्रा - शिव, कलंगी - पार्वती)। इसकी
शुरूआत चंदेरी (मध्यप्रदेश) से शाह अली पीर एवं तुकनगीर ने की थी। चित्तौड़गढ़ में
इसकी शुरूआत हम्मीद बेग एवं सहेडू सिंह ने की थी। प्रमुख कलाकार - चेतनराम, ताराचंद एवं ओंकारसिंह।
भवानी नाट्यशाला:- झालावाड़।
3. लोक नृत्य
1. जनजातियों के नृत्य :-
1.सहरिया जनजाति के नृत्य:
सूत्र:- शहर का शिकारी इन्द्रपरी को झालकर लहंगा छीन लेता है तथा उसे
बीस वर्ष तक पहनता है।
1.शिकारी नृत्य (पुरुष
प्रधान) 2.इन्द्रपरी
नृत्य 3.झेला
नृत्य 4.लहंगी
नृत्य 5.बीसवा
नृत्य (केवल महिलाओं द्वारा)
6.सांग नृत्य
2.भील जनजाति के नृत्य:-
सूत्र:-
गंगैराम हाथी पर बैठकर युद्ध मैदान के चारों ओर घुमकर दो चक्र लगाकर नेजा फहरा
देते हैं।
1.गवरी 2.गैर
(होली के अवसर पर पुरुषों द्वारा) 3.हाथीमना (विवाह के अवसर पर पुरुषों द्वारा) 4.युद्ध 5.घुमरा 6.द्विचक्री 7.नेजा
(होली के तीन दिन बाद शुरू होने वाला युगल नृत्य)
3.गरासिया जनजाति के नृत्य:-
सूत्र:-
रामोजी गरासिया वांकल मां के सामने ज्वार चढाकर गर्व महसूस कर रहे थे।
1.रायण 2.मोरिया 3.गौर 4.वालर:-यह
नृत्य महिलाओं व पुरुषों द्वारा अर्द्धवृत्ताकार घेरे में बिना वाद्ययंत्र के किया
जाता है।
5.कूद:- बिना वाद्ययंत्र के किया जाने वाला नृत्य। 6.लूर 7.मांदल 8.ज्वारा 9.गर्वा।
4.कालबेलिया जनजाति के
नृत्य:-
सूत्र:-
बाईपास हो गई।
1.बांगड़िया
(कालबेलिया महिलाएँ भीख माँगते समय करती हैं) 2.ईंडोणी 3.पणिहारी 4.शंकरिया।
प्रमुख
महिला कलाकार: गुलाबो सपेरा।
-कालबेलिया नृत्य को 2010 में यूनेस्को की विश्व
धरोहर सूची में शामिल किया गया। वाद्ययंत्र - घुरालियो, खंजरी।
5.कथौड़ी जनजाति के नृत्य:-
सूत्र:-
मावजी होली पर कत्था लाकर खाते हैं।
1.मावलिया 2.होली 3.लावणी।
6.मेव जाति के नृत्य:- पूर्वी
राजस्थान - 1.रणबाजा 2.रतवई
(युगल नृत्य)।
6.कंजर जाति के नृत्य:- 1.धाकड़ 2.चकरी
(महिला कलाकार - शांति, फिल्मा, फुल्मा)।
7.गूर्जर जाति के नृत्य:- 1.चरी नृत्य (किशनगढ़, अजमेर)। कलाकार - सुनिता
रावत, मोहनसिंह गौड़, फलकु बाई।
4.व्यावसायिक नृत्य
1.तेरहताली नृत्य:- बाबा
रामदेवजी के मेले के दौरान बैठकर किया जाने वाला नृत्य। इसे प्रसिद्धि दिलाने का
कार्य मांगी बाई ने किया था।
2.कच्छी घोड़ी नृत्य:-
शेखावाटी। इस नृत्य के दौरान झाँझ वाद्य यंत्र बजाया जाता है। यह केवल पुरुषों द्वारा
किया जाता है।
3.भंवाई नृत्य:- मेवाड़। भवाई
नाटक सबसे पहले बाघोजी जाट ने लिखा था।
-कलाकार:- कजली, कुसुम, द्रोपदी, तारा शर्मा, दयाराम भील, सांगीलाल सांगड़िया, कृष्णा व्यास।
-शांता गाँधी ने भवाई लोक नृत्य पर आधारित 'जस्मा ओडन' नाटक लिखा था।
5.धार्मिक नृत्य
1.घूमर नृत्य:- राजस्थान का
राज्य नृत्य। इसे 'रजवाड़ी
नृत्य' और 'नृत्यों की आत्मा' कहा जाता है। गणगौर के अवसर
पर सर्वाधिक किया जाता है। शुरूआत भील समुदाय ने की थी। गणगौर घूमर नृत्य अकादमी
की स्थापना 1986 ई. में
हुई। घूमर नृत्य की विशेष चाल को 'सवाई' कहते
हैं।
2.कत्थक नृत्य:- राजस्थान का
शास्त्रीय नृत्य। इसे 'मंगलमुखी
नृत्य' भी कहते हैं। इस नृत्य की
शुरूआत जयपुर से भानूजी महाराज ने की थी।
3.चाक च्यानवी नृत्य:-
शेखावाटी। गणेश चतुर्थी के अवसर पर किया जाता है।
6. क्षेत्रीय नृत्य
1.बिन्दोरी नृत्य:- झालावाड़।
2.ढोल नृत्य:- जालौर। यह
सांचलिया संप्रदाय में 'थाकना
शैली' में विवाह के अवसर पर
पुरुषों द्वारा किया जाता है। इसे प्रसिद्धि दिलाने का कार्य जयनारायण व्यास ने
किया था।
3.डांग नृत्य:- नाथद्वारा
(राजसमंद)। होली के अवसर पर किया जाने वाला युगल नृत्य। वाद्ययंत्र - ढोल, मांदल, थाली।
4.चंग नृत्य व ढफ नृत्य:-
शेखावाटी।
5.गीदड़ नृत्य:- शेखावाटी।
इसमें सेठ-सेठानी, दूल्हा-दुल्हन, शिकारी आदि नाटक दिखाये
जाते हैं (केवल पुरूष)।
6.अग्नि नृत्य:- कतरियासर
(बीकानेर)। जसनाथी सम्प्रदाय का नृत्य।
7.लांगुरिया नृत्य:- कैलादेवी
(करौली)।
8.नाहर नृत्य:- मांडल
(भीलवाड़ा)। शाहजहाँ के समय शुरूआत हुई।
9.भैरव नृत्य:- ब्यावर
(अजमेर)। होली के अवसर पर बादशाह की सवारी के आगे भैरव नृत्य किया जाता है।
7.अन्य नृत्य
1.ढोला मारू नृत्य - झालावाड़
2.चरकुला नृत्य - भरतपुर
3.बमरसिया नृत्य - भरतपुर (बम
= बड़ा नगाड़ा)
4.कबूतरी नृत्य - चुरू
5.घुड़ला नृत्य - मारवाड़
(शुरूआत सातलदेव के समय। बालिकाएँ अपने सिर पर छिद्रित मटका रखकर नृत्य करती हैं।)
6.डांडिया नृत्य - मारवाड़
7.कच्छी घोड़ी - केवल पुरूषों
द्वारा
8.पेंजवा नृत्य - वांगड़ प्रदेश (दीवाली के अवसर पर)







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